Kheto Me Sareaam Ghumte Tenduye Insaano Parr Badhta Khatra (Bijnor)
बिजनौर (संवाददाता महेंद्र सिंह) : पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के तराई क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों से तेंदुओं का एक चिंताजनक व्यवहार सामने आ रहा है। इस क्षेत्र के गन्ने के घने और नमी वाले खेत, जहाँ तेंदुए बरसों से छिपकर रहते आए हैं, अब इन बड़े बिल्ली प्रजाति के जानवरों के स्वभाव को धीरे-धीरे बदल रहे हैं। खेतों में आसानी से मिल जाने वाला पानी, छुपने के सुनियोजित ठिकाने और बछड़ों–बकरियों जैसे आसान शिकारों ने तेंदुओं को धीरे-धीरे जंगल की कठिन परिस्थितियों से दूर कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार सुविधा मिलने से कई तेंदुए अब “आलसी, भारी-भरकम और कम फुर्तीले” होते जा रहे हैं।
बिजनौर (Bijnor) वन विभाग के अनुसार, जंगल में छोड़े जाने के बाद भी कई तेंदुए वापस खेतों की ओर लौट आते हैं। वजह साफ है — गन्ने के खेत उन्हें आरामदायक जिंदगी देते हैं, जिसमें न शिकार की मेहनत है और न जंगल के बाघों का डर।

चार साल में पकड़े 95 तेंदुए, 40 जंगल में छोड़ने लायक नहीं — शरीर और पंजे खो चुके फुर्ती
बिजनौर (Bijnor) जिले के आंकड़े स्थिति की गंभीरता को साफ दिखाते हैं। पिछले चार वर्षों में जिले से कुल 95 तेंदुए पकड़े गए, लेकिन इनमें से 40 को जंगल में नहीं छोड़ा जा सका। वन विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, इन तेंदुओं के शरीर और पंजों की संरचना, फुर्ती और दौड़ने की क्षमता जंगल की कठोर परिस्थितियों के अनुरूप नहीं रही। खेतों में लंबे समय तक रहने से उनका प्राकृतिक स्वभाव लगभग बदल चुका है।
कुछ तेंदुए इतने ‘फील्ड-हैबिचुअल’ हो चुके हैं कि उन्हें पकड़कर कई किलोमीटर दूर जंगल में छोड़ा गया, फिर भी वे दोबारा इंसानी बस्तियों और खेतों में लौट आए।

बाघों की संख्या बढ़ने से तेंदुओं का जंगल से पलायन
बिजनौर (Bijnor) जिले में तेंदुओं के खेतों में बढ़ते रुझान की एक अहम वजह अमनगढ़ टाइगर रिज़र्व में बाघों की तेज़ी से बढ़ती संख्या भी है। पिछले कुछ वर्षों में यहाँ बाघों की संख्या 12 से बढ़कर 34 हो गई है। बाघों के बढ़ते प्रभाव और घटती जगह ने तेंदुओं को सुरक्षित विकल्प खोजने पर मजबूर किया, और गन्ने के खेत उन्हें सबसे मुफीद जगह लगे — छुपने के कोने, भरपूर पानी और हर दिन मिलने वाला आसान शिकार।
हालांकि यह बदलाव अब इंसानों के लिए जानलेवा खतरा बन चुका है।

सिर्फ बिजनौर में 35 मौतें, 80 गाँव हाई-रिस्क जोन में
जनवरी 2023 के बाद से बिजनौर (Bijnor) में तेंदुओं के हमलों में 35 लोगों की मौत हो चुकी है। ज्यादातर घटनाएँ खेतों के बीच, घरों के पास या पशुओं को बांधने वाले स्थानों के नजदीक हुईं।
जिला प्रशासन ने बिजनौर (Bijnor) के 80 से अधिक गांवों को “उच्च जोखिम क्षेत्र” घोषित किया है, जहाँ अक्सर तेंदुओं की आवाजाही की सूचना मिलती रहती है।
ग्रामीणों में भय का माहौल है, और लगातार बढ़ते हमलों को देखते हुए नाराज़गी भी बढ़ रही है। कई गाँवों में लोग रात होने के बाद खेतों की ओर जाने से पूरी तरह बचते हैं।

स्थायी समाधान की मांग — ‘कैप्चर एंड रिलीज’ पॉलिसी हुई फेल
बिजनौर (Bijnor) वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि तेंदुओं को पकड़कर जंगल में छोड़ देने की सालों पुरानी नीति अब अप्रभावी साबित हो रही है। तेंदुए, जिनका जीवन खेतों में रम गया है, वे दोबारा उसी स्थान पर लौट आते हैं।
स्थानीय सामाजिक संगठनों और वन्यजीव विशेषज्ञों ने बिजनौर (Bijnor) में एक “तेंदुआ संरक्षण एवं रेस्क्यू केंद्र” बनाने की मांग उठाई है, ताकि ऐसे तेंदुओं को सुरक्षित और नियंत्रित माहौल में रखा जा सके।
दूसरी ओर, उत्तराखंड, राजस्थान और अन्य राज्यों ने तेंदुओं को अपने यहाँ स्थानांतरित करने से इंकार कर दिया है। देहरादून, बरेली और लखनऊ के चिड़ियाघरों में भी पहले से क्षमता से अधिक वन्यजीव रखे हुए हैं।
गन्ना कटाई का सीज़न — किसानों की बढ़ी चिंता
इस बीच, गन्ना कटाई का सीज़न शुरू हो चुका है। लेकिन खेतों में छिपे तेंदुओं के चलते किसानों का हर दिन डर के साए में गुजर रहा है। किसान बताते हैं कि फसल काटते समय उन्हें हर आवाज़ संदेहास्पद लगती है। कई बार तेंदुए अचानक खेत से निकलकर हमला कर देते हैं, जिससे मजदूर और किसान खेतों में जाने से कतराने लगे हैं।
बिजनौर (Bijnor) जिले के स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सरकार ने जल्द कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और अधिक विकराल हो सकता है।