Sambhal Me Ravan Ka Putla Banate Karigar
सम्भल (संवाददाता महबूब अली) : उत्तर प्रदेश के सम्भल (Sambhal) जिले में हर साल दशहरे के अवसर पर एक ऐसा दृश्य देखने को मिलता है जो न केवल सांस्कृतिक है बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। यहाँ का एक मुस्लिम परिवार बीते 46 वर्षों से रावण का पुतला बनाकर बुराई पर अच्छाई की जीत के इस पर्व को खास अंदाज में मनाता आ रहा है। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है और आज भी हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश कर रही है।
सम्भल (Sambhal) के रावण का पुतला बनाने वाले कारीगर आसिफ हुसैन बताते हैं कि उनके पिता स्वर्गीय अब्दुल हमीद ने करीब 46 साल पहले यह परंपरा शुरू की थी। तीन साल पहले पिता के निधन के बाद अब इस जिम्मेदारी को आसिफ और उनका परिवार निभा रहे हैं। दशहरे से लगभग डेढ़ महीना पहले से ही पूरा परिवार इस काम में जुट जाता है। बांस, कपड़ा, रंग और कागज से तैयार होने वाले इन पुतलों को देखने आसपास के जिलों से लोग आते हैं।

मेहनत, परंपरा और भाईचारे की मिसाल
सम्भल (Sambhal) के आसिफ हुसैन के अनुसार हर साल वह दर्जनों रावण के पुतले बनाते हैं, जिन्हें सम्भल (Sambhal) के अलावा कुंदरकी, हजरतनगर गढ़ी, बहजोई और सौधन जैसे कस्बों व आसपास के जिलों में भेजा जाता है। इस काम में केवल उनका परिवार ही नहीं, बल्कि आसपास के हिन्दू-मुस्लिम साथी भी मिलकर योगदान देते हैं।
आसिफ बताते हैं, “काम के दौरान कोई भेदभाव नहीं होता। हमारी टीम में हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही शामिल होते हैं। हम सब मिलकर भाईचारे और मोहब्बत के साथ इस परंपरा को निभाते हैं।” पुतलों की ऊंचाई और डिजाइन मांग के हिसाब से तैयार की जाती है। कहीं दस फुट तो कहीं बीस से तीस फुट तक ऊंचे पुतले बनाए जाते हैं।
सम्भल (Sambhal) में दशहरे के दिन जब इन्हें दहन किया जाता है, तो इस मुस्लिम परिवार के योगदान की सराहना हर तरफ होती है। स्थानीय लोग इसे न केवल एक परंपरा बल्कि आपसी भाईचारे का संदेश मानते हैं।
गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक
सम्भल (Sambhal) के स्थानीय निवासी इस परिवार के प्रयासों को गंगा-जमुनी तहजीब का जीवंत उदाहरण मानते हैं। दशहरे पर्व के अवसर पर आतिशबाजी और रावण दहन के दृश्य के बीच इस मुस्लिम परिवार की मेहनत और योगदान पर गर्व किया जाता है।
सम्भल (Sambhal) जिले के लोगों का कहना है कि करीब आधी सदी से चली आ रही यह परंपरा यह दर्शाती है कि इस धरती में मोहब्बत और एकता की खुशबू अब भी जीवित है। धर्म और जाति से ऊपर उठकर इंसानियत और परंपरा को निभाना ही असली पहचान है।
सम्भल (Sambhal) जिले के इस मुस्लिम परिवार ने साबित किया है कि सांप्रदायिक सौहार्द सिर्फ शब्दों में नहीं बल्कि कर्म में भी जीया जा सकता है। दशहरे के इस पर्व पर उनका योगदान यह संदेश देता है कि एकता और भाईचारा समाज की सबसे बड़ी ताकत है।
एकता और प्रेम का संदेश
आसिफ हुसैन कहते हैं, “हमारा प्रयास है कि दशहरे का यह पर्व केवल रावण दहन तक सीमित न रहे बल्कि यह एकता और भाईचारे का संदेश दे। इस परंपरा में हर धर्म और जाति के लोग शामिल होते हैं और मिलकर काम करते हैं।”
यह परंपरा सिर्फ सम्भल (Sambhal) तक सीमित नहीं है बल्कि आसपास के जिलों में भी इसका प्रभाव है। लोग इस मुस्लिम परिवार के योगदान को याद रखते हैं और इसे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। यही वजह है कि दशहरे के इस पर्व में यह परंपरा एक प्रेरणा बन चुकी है।
सम्भल (Sambhal) में दशहरे पर रावण पुतला बनाने वाले इस मुस्लिम परिवार की कहानी यह दिखाती है कि असली पर्व वह है जो समाज में भाईचारे और प्रेम का संदेश दे।