Shahi Jama Masjid Maamle Me Naya Mod Kashif Khan Ne Uthaye Sawal (Sambhal)
संभल (Sambhal) (संवाददाता महबूब अली) : बहुचर्चित शाही जामा मस्जिद विवाद में एक बार फिर नया मोड़ आ गया है। मामले में काशिफ खान ने चन्दौसी की लोअर कोर्ट में अर्जी दाखिल कर खुद को पक्षकार बनाए जाने की मांग की है। काशिफ खान का कहना है कि वह इस प्रकरण में शुरू से ही हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करते रहे हैं, जबकि ज़फर अली खुद को जामा मस्जिद का सदर बताकर पक्षकार बने हुए हैं।
काशिफ खान ने अदालत में दी गई अर्जी में ज़फर अली की भूमिका और उनकी वैधता पर सवाल उठाए हैं।

‘मेरी ट्रस्ट रजिस्टर्ड है, फर्जी बताना गलत’
काशिफ खान का दावा है कि उनकी ट्रस्ट विधिवत रूप से रजिस्टर्ड है और उसका पंजीकरण संभल (Sambhal) रजिस्ट्रार ऑफिस के साथ-साथ उम्मीद पोर्टल पर भी दर्ज है।
उन्होंने कहा कि शाही जामा मस्जिद की देखरेख, मुसाफिरखाने का संचालन और केयरटेकर की जिम्मेदारी उनकी ट्रस्ट निभा रही है। इसके बावजूद ज़फर अली द्वारा उनकी ट्रस्ट को फर्जी बताना भ्रामक और तथ्यहीन है।
कोर्ट नोटिस और सर्वे को लेकर उठाए सवाल
काशिफ खान ने आरोप लगाया कि संभल (Sambhal) की चन्दौसी कोर्ट की ओर से जुलाई और अक्टूबर में कई नोटिस जारी किए गए, लेकिन ज़फर अली और उनकी कथित कमेटी ने उनका जवाब नहीं दिया। कोर्ट द्वारा दिए गए 15 दिन के ग्रेस पीरियड का भी उपयोग नहीं किया गया।
उनका कहना है कि इसी के चलते कोर्ट ने 19 तारीख को एकतरफा सर्वे का आदेश दिया। काशिफ खान का दावा है कि यदि समय रहते नोटिस की जानकारी दी जाती, तो हाईकोर्ट में अपील कर सर्वे को रोका जा सकता था।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 24 तारीख को बिना किसी न्यायिक आदेश के, प्रशासनिक आदेश के आधार पर दोबारा सर्वे कराया गया, जिसके बाद क्षेत्र में तनाव और हिंसा की स्थिति बनी। उन्होंने सवाल उठाया कि इस स्थिति की जिम्मेदारी किसकी है।
‘राइट टू एक्सेस’ बनाम मंदिर दावा—मीडिया पर भी उठाए सवाल
संभल (Sambhal) से काशिफ खान ने स्पष्ट किया कि लोअर कोर्ट में दाखिल याचिका में हरिहर मंदिर का कोई सीधा दावा नहीं किया गया है। उनके अनुसार, याचिका में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के सेक्शन 18 के तहत ‘राइट टू एक्सेस’ की मांग की गई है।
उन्होंने मीडिया के एक हिस्से पर आरोप लगाया कि तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर मंदिर दावे की खबरें चलाई जा रही हैं, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।
1927 के एग्रीमेंट का दिया हवाला
संभल (Sambhal) से काशिफ खान ने 1927 में भारतीय पुरातत्व विभाग और इंतज़ामिया कमेटी के बीच हुए समझौते का हवाला देते हुए कहा कि उस समझौते के अनुसार गैर-मुस्लिम भी मस्जिद परिसर को देख सकते हैं, लेकिन मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं का सम्मान जरूरी है।
लोअर कोर्ट में भी मजबूती से रखेंगे पक्ष
अंत में काशिफ खान ने कहा कि वह लोअर कोर्ट में भी औपचारिक रूप से पक्षकार बनकर अपना पक्ष मजबूती से रखेंगे, जैसे वह पहले से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में रखते आ रहे हैं।
संभल (Sambhal) की शाही जामा मस्जिद से जुड़े इस मामले में अब अदालत की अगली सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं।